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मानव खुशहाली के लिए हो जल संरक्षण और वृक्षारोपण : दलाई लामा

देवास(मध्यप्रदेश). तिब्बती आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा ने बदलाव के लिए ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने तथा बुनियादी ढांचा विकसित करने को आज जरूरी बताया लेकिन कहा कि खुशहाली के लिये जल संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे उपाय आवश्यक हैं और इसी से दुनिया की सात अरब आबादी के जीवन में बड़ा परिवर्तन आएगा. तिब्बती धर्मगुरु ने देवास जिले के तुरनाल में पवित्र नर्मदा नदी के तट पर, नर्मदा सेवा यात्रा के जन जागरण अभियान के तहत यहां आयोजित विशाल जन समूह को संबोधित करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश सरकार ने पवित्र नर्मदा की निर्मलता और इसके संरक्षण के लिये सराहनीय कदम उठाए हैं. उन्होंने कहा कि सरकार के स्तर पर किए जाने वाले इस तरह के प्रयास से ही भविष्य के लिए पर्यावरण को अनुकूल बनाकर नदी सभ्यता और जल को बचाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि जीवन के लिए विकास जरूरी है लेकिन जीवन को बचाने के लिए प्रकृति काे संरक्षित करना उससे भी ज्यादा जरूरी है. विश्व समुदाय को ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट से बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है और इसके लिए जल, नदी तथा वृक्ष जरूरी है. उनका कहना था कि भारत की प्राचीन सभ्यता ने दुनिया को जीवन जीना सिखाया है और अब इसी देश से दुनिया को यह संदेश मिलना चाहिए कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना गांव का विकास कैसे करना है. प्राथमिकता के आधार ग्रामीण क्षेत्र में उच्च स्तरीय शिक्षा तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा देकर वहां बडा बदलावा लाया जा सकता है. दलाई लामा ने कहा कि जीवन के लिए भोजन जरूरी है. बिना भोजन के और तकनीकी विकास के बल पर जीवित नहीं रहा जा सकता है. एकजुटता, खुशहाली और सुख चैन सभी को चाहिए. यह पूरी दुनिया के मानव जाति की जरूरत है. विश्व की सात अरब जनता को इसी तरह की खुशहाली चाहिए और यही खुशहाली में बदलाव ला सकती है. जाति, धर्म और नस्ल के आधार पर काम करने से यह खुशहाली नहीं आएगी, बल्कि इसके लिए निस्वार्थ होकर काम करने की जरूरत है. प्रकृति ने हमें जो कुछ दिया है, उसको अपने और आने वाली पीढियों के लिए संरक्षित करके रखना हम के लिए आवश्यक है. उन्होंने कहा कि पानी आज के मानव समाज के लिए बड़ा संकट बन गया है. इसे बचाने और संरक्षित करने की आवश्यकता है. भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को इसकी चिंता करनी चाहिए. हमारे पूर्वजों ने पवित्र नदियों के रूप में हमारे लिए यह बड़ी धरोहर छोडी थी, लेकिन हमने उसे प्रदूषित कर दिया है. तकनीकी का विकास आवश्यक है लेकिन ऐसा विकास अनुचित है जो मानव सभ्यता के लिए खतरनाक हो रही है. आध्यात्मिक गुरू ने कहा कि भौतिक विकास ज्यादा देर तक सुख नहीं दे सकता है. असली सुख मानसिक सुख से ही मिल सकता है और मानसिक सुख के लिए जरूरी है कि पेट की भूख खत्म हो और प्राकृतिक माहौल मिले. नदियों में जल हो और यह जल स्वच्छ रहे. उन्होंने कहा कि नर्मदा को संरक्षित करने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, उसमें सभी लोगों को हिस्सा लेना चाहिए और अपनी इस धरोहर को संरक्षित करना चाहिए. अनूपपुर जिले में स्थित नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक से नर्मदा सेवा यात्रा दिसंबर माह में प्रारंभ हुयी है और यह राज्य के विभिन्न जिलों से गुजरकर मई माह में वापस अमरकंटक पहुंचकर संपन्न होगी.

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